अरुणाचल की कहानियाँ- 02  : बैटल ऑफ़ वालोंग और बिहार रेजिमेंट

समसारा एक तरफ़ चुपचाप खड़ी मुझ पर हँस रही थी, मानों कह रही हो- सारा क्रेडिट तुम ही ले जाते हो।

समसारा

“अरे, सासाराम और आरा ज़िला से कौन-कौन है जी? जल्दी इधर आओ, देखो कौन आया है।” बिहार रेजिमेंट के आर्मी के उन अफ़सर ने आवाज़ लगाई और तीन-चार जन भागे-भागे आ गए। फिर तो सवालों की झड़ी लग गई, “दिल्ली से बाइके से आ गइनी? अकेलहीं घूमत बानी। केतना दिन लागल आवे में? माने के पड़ी रउवा के।”

अरुणाचल प्रदेश के अंजाव ज़िले में वालोंग टाउन से क़रीब 20 किलोमीटर ऊपर, पहाड़ पर स्थित ‘हेलमेट टॉप’ पर जब पहुँचा तो शाम घिर आई थी और कड़ाके की सर्दी थी। रास्ते में आत्माओं के नाम पर सिर्फ़ चंद मिथुन से सामना हुआ। सेना के बैरियर पर मुझे रोक लिया गया और रजिस्टर में एंट्री करवाई गई। ऐसी किसी संवेदनशील जगह पर पहली बार बिहार रेजिमेंट से सामना हुआ। दूरस्थ इलाकों में यात्रियों, ख़ासकर बाइकर्स के प्रति आर्मी की मेहमाननवाजी के बारे में अभी तक सिर्फ़ देखा-सुना था, लेकिन यहाँ पहुँचते ही जिस तरह मुझे गर्मागर्म चाय परोसी गई, मैं भी उसका गवाह बन गया। थोड़ी देर बाद नाश्ता भी थमा दिया गया।

बिहार रेजिमेंट के वीर साथी

“बिहार का लड़का सब भी अब इस तरह से दूर-दूर इलाक़ों में घूम रहा है। बहुत ख़ुशी की बात है। हम लोग तो सोच भी नहीं सकते थे, अपने टाइम में।” उन अफ़सर के लिए दिल्ली नंबर प्लेट की मेरी बाइक और बिहार का भोजपुरी लड़का कौतुहल का विषय थे। समसारा एक तरफ़ चुपचाप खड़ी मुझ पर हँस रही थी, मानों कह रही हो- सारा क्रेडिट तुम ही ले जाते हो। हेलमेट टॉप स्थित आर्मी कैंप पहुँचने से क़रीब 100 मीटर पहले ही मैंने अपना कैमरा बंद कर दिया था, हमेशा की तरह। सेना के जवानों के साथ बातों का सिलसिला चल निकला। वालोंग, 1962 के चीन युद्ध की कहानियाँ, सैनिकों की वीरगाथाएँ, नामती वैली और न जाने कितनी चीज़ें उस ठंड में घुलने-मिलने लगीं।

वालोंग को दुनिया 1962 के भारत-चीन युद्ध (बैटल ऑफ़ वालोंग) से पहचानती है, इतिहास के सबसे ख़ूनी युद्ध में से एक। वही युद्ध जिसमें सैनिकों ने तमाम मुश्किलों, परेशानियों, और संसाधनों की कमी के बावजूद डटकर दुश्मन का सामना किया। वालोंग मिश्मी भाषा का शब्द है जिसमें ‘वा’ का अर्थ होता है- बाँस और ‘लोंग’ का मतलब जगह। इतिहास से इतर यह जगह इतनी ख़ूबसूरत है जिसे बयां कर पाना मुश्किल है। नीचे कल-कल बहती लोहित नदी जिसके नीले पानी में चंद मिनट झाँक लेने से सारे दर्द दूर हो जाते हैं, चारों तरफ़ मिश्मी हिल्स के ऊँचे पहाड़, हवा में झूलते छोटे-बड़े पुल जिन पर चलकर जीवन और जीवंत हो उठता है। और पास में ही है वह जगह है जहाँ भारत में सबसे पहले सूर्योदय होता है, डॉन्ग। अरुणाचल को ‘उगते सूरज का देश (पर्वत)’ का तमगा दिलाने के पीछे शायद यही जगह है।

वालोंग वॉर मेमोरियल ( साभार – ईस्ट मोजो )

हेलमेट टॉप पर पुराने असलहों के अलावा वे पोस्ट (खंभे) भी रखे गए हैं जिनसे चीनी सैनिकों ने भारतीय जवानों को बाँध दिया था और कई दिनों तक भूखा-प्यासा तड़पने के लिए छोड़ दिया था। सेना के जवानों ने उन पोस्ट का ज़िक्र करने में हिचकिचाहट दिखाई, लेकिन जब मैंने पूछा तो उन्होंने सारी बातें बताईं। मुझे बताया गया कि हेलमेट टॉप से आगे जिन पहाड़ों पर लड़ाइयाँ लड़ी गई थीं, वहाँ तक अब सरकार टूरिस्ट के लिए रास्ता खोल सकती है। उस जगह को पर्यटन के लिहाज से विकसित करने पर बात हो रही है। अरुणाचल में बाइक चलाकर लगता है कि हर चंद किलोमीटर बाद भारत-चीन सीमा है और हर सीमा तक पहुँचने की लालसा उमड़ने लगती है। आगे मैं किबित्थू और काहो (भारत का आख़िरी गाँव) तक गया जिसकी कहानियाँ बाद में।

शाम का धुंधलका रात में तब्दील होने लगा था और बातों का सिलसिला ख़त्म होने को नहीं आ रहा था। शायद, बिहार के उन जवानों को बहुत अरसे बाद कोई अपने उधर का यात्री मिला था। बाद में उन अफ़सर ने आवाज लगाई और मुझे एक सिपाही हाथों में दो डिब्बा पकड़े मेरी तरफ़ आता दिखाई दिया। अफ़सर बोले, “यह आपके लिए मिठाईयाँ। त्योहारों का सीज़न है, ख़ाली हाथ कैसे जाने देंगे।” मैंने देखा उन दोनों डिब्बों पर आर्मी का मार्का था। मैंने थोड़ी ना-नुकुर की और डिब्बों को समसारा पर किसी तरह बाँध दिया। लौटने लगा तो पीछे से आवाज़ आई, “फिर से आइएगा। अपनी तरफ़ का कोई आता है तो अच्छा लगता है।”

…अपना शब्द सुनकर याद आया कि मैं भी क़रीब एक साल से बाहर (पूर्वोत्तर में) हूँ और घर पर मेरे लिए भी कई लोग राह तक रहे होंगे। मैंने मोह पर काबू पाने के लिए समसारा के कान ऐंठ दिए और वह अपनी आवाज़ में रोते हुए घुमावदार रास्तों पर अँधेरे में सरपट भागने लगी। आगे एक मिथुन चुपचाप एक अँधेरे कोने में खड़ा था जिसने गरदन उठाकर पूछा- कब लौटोगे? मैंने उसको नज़रअंदाज़ करने का स्वाँग रचा और आगे बढ़ गया। (क्रमशः)

लोहित का किनारा

अगले भाग में जानिए  कहानी उस गांव की जिसे भारत का आख़िरी नहीं, बल्कि पहला गाँव बुलाते हैं…

हमारे घुमक्कड़ साथी प्रकाश बादल के बारे में जानने के लिए पढ़िए – अरुणाचल की कहानियाँ- 1: वो घर जो रेलगाड़ी के डिब्बे जैसा था

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